पदमावती, भंसाली और कॉन्ट्रोवर्सी : “आस्था को ठेस” बनाम “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता “

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कुछ ही महीनों पुरानी बात है जब मशहूर निर्देशक संजय लीला भंसाली के साथकरणी सेनाके लोगों ने जमकर झूमाझटकी की थी और तोड़ फोड़ कर पदमावती फ़िल्म की शूटिंग बंद करवा दी थी। अब यह फिल्म बनकर तैयार है और भंसाली ने अपनी फिल्म का ट्रेलर लांच कर दिया है।  ये ट्रेलर २४ घंटों के अंदर ही वायरल हो गया है और सबसे तेज़ी से १५ मिलियन व्यूज के पड़ाव को पार करने का रिकॉर्ड बनाया है।  जो यूट्यूब के इतिहास में दुनिया की किसी भी फिल्म ने नहीं किया है।  बहरहाल सवाल ये है की क्या कॉन्ट्रोवर्सी , आस्था और मीडिया का तड़का आधुनिक मनोरंजन के व्यंजनों के अभिन्न इंग्रीडिएंट्स हैं ?

क्या आज के भारत में आस्था को ठेस के नाम पर कोई भी किसी के साथ अमानुषी व्यवहार कर सकता है ? याक्या कोइ भी कला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में कुछ  भी सिनेमा के परदे पे दिखा सकता है ? ये तीनों सवाल बहोत बड़े हैं और इनका किसी प्रतियोगी परीक्षा के प्रश्न की तरह मल्टीप्ल चॉइस ऑब्जेक्टिव आंसर तो हो ही नहीं सकता।  इन प्रश्नों से जी चुराना सभी चाहेंगे लेकिन यथार्थ यह है की इन प्रश्नों का सामना करना आज के समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। 

किसी ने खूब कहा है “We are what we see. We are products of our surroundings.” अर्थात  हम जैसा देखते हैं वैसे हो जाते हैं हम अपने आस पास के परिवेश के उत्पाद हैं।  जैसा परिवेश वैसा उत्पाद।  ये बात किसी से छुपी नहीं है की हिंसा से भरपूर वीडियो गेम्स की चपेट में आकर आज के बच्चे हिंसा को कूल और अहिंसा को बोरिंग मानने लगें हैं।  ठीक उसी तरह सोशल मीडिया के एडिक्ट कुछ व्यस्क भी भ्रामक व्हाट्सप्प मैसेजेस और अफ़वाहों से भरे फेसबुक पोस्ट्स की चपेट में हैं। सारांश ये है की मीडिया जिनमे फ़िल्मकार भी आते हैं अपनी रचनाओं को लोगों तक पहुँचाने के लिए किसी भी हद तक जा रहें हैं।  फिर चाहे वह विषय का चयन हो या उसका प्रस्तुतिकरण या मार्केटिंग इस बात का खासा ध्यान दिया जा रहा है की कंट्रोवर्सी का पुट अवश्य हो और हम दर्शक भी इस बुरी लत के आदि हो चले हैं। 

बहरहाल पदमावती की कहानी मेवाड़ के लोक साहित्य का अभिन्न अंग है और सदियों से ये कहानी  प्रचलित है।  भारत जैसे पुरुष प्रधान देश में रानी पद्मिनी जैसी नारी की वीरगाथा मरुस्थल में मीठे पानी की झील सी प्रतीत होती है। यह कहानी देश की नयी पौध तक पहुंचना आवश्यक है लेकिन बिना किसी तथ्यात्मक त्रुटि के। दूसरी ओर कुछ  रूढ़िवादी संगठन ध्यानाकर्षण के ध्येय से फ़िल्म की रिलीज़ का अधीरता से प्रतीक्षा कर रहें है ताकि कब फिल्म लगे और कब ये अपनी सफ़ेद झूठी आस्था के नाम पर गुंडा गर्दी करें और सिनेमा के परदे फाड़ें।

वहीँ भंसाली भी पीछे नहीं हैं वह फिल्म इतिहास के वह पुराने पत्थर हैं जिसकी चमक नहीं गयी है।  उन्होंने सितारा संस्कृति को अपेक्षाकृत नए कलाकारों की मदद से ध्वस्त कर दिया है।  भंसाली की आखिरी तीन फिल्में किसी भी खान , बच्चन या कपूर के लिए नहीं बनीं हैं।  पर इस बार उन्होंने मेवाड़ के लोक साहित्य  को विषय लेकर आग से खेलने का काम किया है। अगर उन्होंने मात्र मनोरंजन परोसने के लिए भारत के इतिहास की एक महान कहानी के साथ खिलवाड़ किया होगा तो दर्शक वर्ग उन्हें खिलजी की नज़र से ही देखेगा। इसके लिए फिल्म की रिलीज़ का इंतज़ार करना होगा।  इस बात में कोई संशय नहीं की फिल्म का ट्रेलर बहोत ही प्रभावोत्पादक है पर रणबीर सिंह का ख़िलजी अवतार हॉलीवुड के प्रसिद्ध धारावाहिक के किरदार खाल ड्रोगो से काफी प्रभावित लगता है जो की दुखी करने वाला है। 

भंसाली  मंजे हुए फ़िल्मकार हैं उन्होंने ख़ामोशी फ़िल्म में नाना पाटेकर और बैंडिट क्वीन फेम सीमा बिस्वास जैसे कलाकारों से मूक बधिर पात्रों का सफलतापूर्वक फिल्माँकन किया था।  यह बात समझ से परे है की उन्होंने किसी के काम की नक़ल क्यों की बजाय खुद खिलजी के चरित्र का चित्रण करने के,हो सकता है शायद ये भी एक मार्केटिंग स्ट्रेटेजी हो क्योंकि गेम ऑफ़ थ्रोन्स दुनिया के सफलतम धारावाहिकों में गिना जाता है।  जो भी हो दर्शकों को फिल्म का बेसब्री से इंतज़ार है आशा करतें है फिल्म पद्मावती के चरित्र का सही बखान करे और एक बड़ी हिट साबित हो।       

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