देश के अदृश्य पहरेदार – रॉ एजेंट्स

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देश के विदेशी और घरेलू मामलों के अलावा, आतंकवाद और अलगाववाद की सारी जानकारियां, चुपके-चुपके हासिल करके सरकार तक पहुंचाने वाले, अदृश्य पहरेदारों के बारे में कोई नहीं जानता। यह एक ऐसी संस्था है, जिसकी कोई भी जानकारी कभी भी सार्वजनिक नहीं की जाती। हमारी स्पेशल रिपोर्ट वाली वीडियो देखें इस लेख के अंत में।  

क्यों किया गया इस गुप्त संस्था का गठन ?

सन १९६२ के भारत-चीन युद्ध और १९६५ के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान एक ऐसी संस्था की जरूरत महसूस हुई, जो देश और विदेशों में गुप्त रूप से कार्य करके दुश्मन की गुप्त सूचनाएं सरकार तक पहुचायें। इसी उद्देश्य को लेकर इस संस्था का गठन किया गया।

 

इस गुप्त संस्था को किस नाम से पुकारते हैं ?

आइये हम आपको बता ही दें कि हमारे देश की उस गुप्तचर संस्था का नाम है “रिसर्च एंड एनालिसिस विंग” जिसे शार्ट कट में “रॉ”  कहते हैं।

रॉ क्या है और क्या करता है ?

१-  इस संस्था की सबसे बड़ी खूबी इसकी गोपनीयता है। इसकी किसी भी कामयाबी का कभी भी, कहीं भी जिक्र नहीं होता।

२- इसका गठन “रामेश्वर राव काव” के नेत्तृव में देश के कुशल गुप्तचरों को लेकर किया गया।

३- बांग्ला देश का उदय और रॉ की भूमिका

अपने गठन के मात्र ३ वर्षों के भीतर ही १९७१ में भारत-पूर्वी पाकिस्तान की लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए “रॉ” ने भारत को विजय दिलवाई। इसके गुप्तचरों ने भारतीय नौसेना को चटगाँव बंदरगाह पर कब्जा करने में सफलता दिलवाई। “रॉ” की मदद से ही ऑपरेशन सर्चलाइट के द्वारा हमारी वायुसेना ने दुश्मन के महत्व पूर्ण ठिकानों पर बमबारी की। विश्व के नक़्शे पर एक नए राष्ट्र “बांग्लादेश” के उदय में “रॉ” का विशेष रोल रहा है।

४ – सिक्किम को भरत में मिलाने का काम-

अधिनायकवादी चीन की लोलुप निगाहें सिक्किम की ओर लगीं रहती थीं। “रामेश्वर नाथ काव” के नेतृत्व वाली टीम के गुप्तचरों ने चीन की हर कोशिश को नाकाम कर दिया। “रॉ” की अथक कोशिशों के कारण ही सिक्किम भारतीय गणतंत्र का २२ वां राज्य बन गया।

 

५ — श्रीलंका में सत्ता परिवर्तन —

श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति “महिंद्रा राजपक्षे” चीन के साथ अपने सम्बन्ध बढ़ा रहे थे, जो भारत के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित होता। इसी खतरे को भांप कर काव ने ऐसी चाल चली जिससे श्रीलंका में होने वाले अगले चुनाव में महिंद्रा हार गए और वहां की सरकार बदल गई। भारत पर आया खतरा टल गया।

६ -देश के परमाणु कार्यक्रमों की गोपनीयता का काम —

भारत के समस्त परमाणु कार्यक्रमों की छोटी से छोटी और महत्वपूर्ण जानकारियों को गुप्त रखने में भी “रॉ” अपना पूर्ण योगदान दे रही है। इसके कारण ही अमरीका के खुफ़िआ एजेंसी सी.आई.ए. हमारी गुप्त सूचनाएं लेने में विफल रही है।

७ – अति गोपनीय और खतरों भरा काम होने के बावजूद इसके गुप्तचर निहत्ते रहते हैं। अति आवश्यक होने पर ही ये हथियारों का उपयोग करते हैं वर्ना अपने बुद्धि कौशल से ही परिस्थितियों का सामना करते हैं।

८ – इस विभाग की गोपनीयता

इसकी गोपनीयता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके गुप्तचरों के परिवार वाले भी इनके काम-काज के बारे में कुछ भी नहीं जानते।  “रॉ” के एजेंटों की गोपनीयता उनकी मौत के साथ ही दफन हो जाती है।

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